मेरी जुबान

मेरी जुबान

किसी विद्वान का कथन है कि ,”इंसान एक दुकान है और जुबान उसका ताला |जब ताला खुलता है तभी मालूम पड़ता है कि दुकान सोने की है या कोयले की|”सच है जुबान का बड़ा महत्त्व है|खासकर जब ये जुबान दिल की जुबान हो|”मेरी जुबान”हजारों उन जुबानों को आवाज देगी जो अन्याय के विरुद्ध बोल नाही पाते,चुप रह जाते हैं|आज से “मेरी जुबान” उन सब जुबानों की आवाज होगी जिनके सीने में जज़्बात उमड़ते तो हैं पर शब्दों की शक्ल में ढाल नहीं पाते|”मेरी जुबान “धुन होगी उन गीतों -कविताओं की जो दिल ही दिल में गुनगुनाए तो जाते हैं पर होठों पर नहीं आते|”मेरी जुबान”दीपक होगी उन राहों की जिन पर नन्हें-नन्हें बच्चे चल कर रहे हैं उन्हें ये रास्ता दिखाएगी|”मेरी जुबान”आत्मविश्वास होगी उन महिलाओं का जिन्हें समाज हमेशा दोयम दर्जे का मानता है|”मेरी जुबान” बाजन होगी उस आत्मा का जो परमात्मा से संवाद करना चाहती है|”मेरी जुबान” शिक्षा होगी उस जिज्ञासु के लिए जो ज्ञान के सागर में अवगाहन करना चाहता है|”मेरी जुबान”पहचान होगी हमारी उस सनातन संस्कृति की जिसे चाह कर भी कोई नहीं मिटा पाया|”मेरी जुबान प्रतिबिंब होगी उन सुविचारों की जिनको आचरण में उतार कर ही मानव-मानव कहला सकता है|”मेरी जुबान आज से आप सबकी जुबान होगी|”मेरी जुबान”समाज को एक नई दिशा देगी|

“ये जुबान अब रोके न रुकेगी|”

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