गांवो को आवाज

गाँवों को आवाज़

अब के खेतों में बिजूका कोई सजाया जाए |

पूरी आवाज़ से गाँवों को फिर बुलाया जाए ||

लोगों ने रख दिए हैं मेरी राहों में जो पत्थर

उनही पत्थरों से अब घर कोई बनाया जाए ||

ले चलें आज जुगनुओं की बारात झोंपड़ी में

यहाँ भी कभी एक नया सूरज जलाया जाए||

फिर टटोलें ज़रा नीम के नीचे दबे कहकहे

आज झुर्रियों को किसी बात पे हँसाया जाए||

फांसी चढ़ा दो इन खुदकशी की आदतों को

उसकी जिजीविषा को सूद समेत लौटाया जाए||

चिपकता है होठों पे मेरे ताजे गुड का जायका

‘उदास’चलो लोटे के सट्टुओं को खाया जाए||

 

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नंदिनी

नंदिनी

अपनों के लिए अपनों से दंश सह रही है नंदिनी |

संतान सफल हो इसलिए एकाकी रह रही है नंदिनी ||

बचपन की त्याग कर सभी अल्हड़ अठखेलियाँ

गंगा की तरह शांत ,गंभीर बह रही है नंदिनी ||

नव नीड़-निर्माण -निरत हैं सुत-सुता

उनकी सफलता के आशीर्वचन कह रही है नंदिनी ||

देह जीर्ण हृदय विदीर्ण धारण किया पर धैर्य को

त्याग की प्रतिमूर्ति बन वसुधा सी सब सह रही है नंदिनी||

नंदिनी नाम नारी का जो सबके सुख में सुखी

आरती की लौ बनी मौन में सब कह रही है नंदिनी||

 

अब तो आओ गिरधारी

अब तो आओ गिरधारी

लूट रही द्रौपदी की लाज अब तो आओ गिरधारी |

बिगड़ गए सब काज अब तो आओ गिरधारी||

ऊँची अट्टालिकाओं ने खा ली जगह झोंपड़ी की

दब गई सुदामा की आवाज अब तो आओ गिरधारी ||

बेचारों और लाचारों की अब कोई नही सुनता

भ्रष्ट हुए हैं ताज अब तो आओ गिरधारी ||

ग्राह्य गरीबी के ने जकड़ा हलधर जैसे गज को

कोई न सुनता आज अब तो आओ गिरधारी ||

भूखे पेट सो जाते है बच्चे सुन सपनों की लॉरी

सड़ता सड़कों पे अनाज अब तो आओ गिरधारी||

भार के भविष्य की चिंता नही किसी को आज

हुआ स्वार्थी यह समाज अब तो आओ गिरधारी||

विप्लव तान

(1)             विप्लव तान

शत्रु दल की चाल है|

सो आज लहू में उबाल है|

तानी हुई हैं भृकुटिया

तना हुआ कपाल है||

दामिनी दमक रही

आ रहा भूचाल है |

शत्रुदल के सामने

जनसमूह विशाल है||

कामनियाँ ये कमनीय

प्रभात प्रथम पूजनीय

चूड़ियों को छोड़ कर

थाम रही करवाल हैं||

परियों की कहानियाँ

न कहती अब नानियाँ|

पाठ बलिदान के

पढ़ रही जवानियाँ ||

आँच रोम रोम तक |

आवाज पहुँचे व्योम तक |

आज या अरि हंत है

या आत्मा है होम तक||

प्रबुद्ध समृद्ध या बलवान|

धीर वीर  या प्राणवान|

मांग रही है मातृभूमि

आज लोहित्य बलिदान||

अरिदल का काल बन|

तू तांडव की ताल बन|

विप्लव तान सुना रिपु को

विश्व में विशाल बन||

स्वच्छ भारतम स्वस्थ भारतम

स्वच्छ भारतम स्वस्थ भारतम

आओ मिलकर कसम उठाएँ,स्वच्छ भारत अभियान की |

गंदगी मिलकर दूर करेंगे हमने मन में ठान ली ||

स्वच्छ भारतम स्वस्थ भारतम ||

ये हैं अपने राजू भैया ,भैंस के भाई कहाते हैं |

उनकी तरह जुगाली कराते गुटखा पान चबाते हैं|

हैं तो वैसे परचूनिया पर चित्रकार बन जाते हैं |

यहाँ वहाँ थूक कर दीवारें पीक से रंग जाते हैं |

उनको आदत डलवाओ कोई तो पीकदान की ||

ये हैं अपनी कमला मौसी घर को खूब चमकाती हैं |

ढूंढ ढूंढ कर हर कोने से कूदधा बीन कर लाती हैं |

धूल,गंदगी और कूढा देखते ही चिल्लाती हैं|

पर घर का सारा कूढा सड़क पर डलवाती हैं|

इनको आदत दलवाओ कोई तो कूड़ेदान की ||

इनसे मिलिए शर्मा फैमिली पिकनिक खूब मनाते हैं|

हर वीकेंड पर ये मिलकर लॉन्ग ड्राइव पर जाते हैं |

कोल्ड ड्रिंक्स चिप्स और आइसक्रीम भर भर कर ये खाते हैं|

फिर  रैपर वैपर और बोतल पार्क में छोड़ के जाते हैं|

चलती गाड़ी से कूड़ा फेंके फिक्र नहीं सम्मान की ||

छोड़ो सबकी चर्चा वर्चा हम ये कसम से उठाएंगे |

कहीं कूड़ा नही करेंगे कसम देश की खाएँगे|

नदियों को भी साफ करेंगे कचरा नहीं बहाएँगे |

पोलीथिन और गंदगी मुक्त भारत देश बनाएँगे |

बदलेंगे तस्वीर हम ही तो अपने हिंदुस्तान की ||

सुन भैया

सुन भैया

चाय में चीनी कम है भैया |

बजट ज़रा बेदम है भैया ||

नून तेल की मारामारी

खारी आँखें नाम है भैया||

नीड़ कहाँ से जगह बनाए

आँखों में शबनम है भैया ||

किसकी करें शिकायत किससे

हर सरकार उत्तम है भैया ||

इतनी आसानी से न सुलझेंगे

ज़िंदगी के पेचो-खम भैया ||

दिल में मत रखना कोई शिकवा

तुमको मेरे कसम भैया ||

बरखा पड़ गई भायली

बरखा पड़ गई भायली

कैसे बरखा पड़ गई भायली|

किस्मत कैसे बिगड़ गई भायली ||

काले पड़ गए गेहूं के दाने

सरसों सारी उजड़ गई भायली ||

कर्ज़ उठा कर बोये थे दाने

बाली-बाली सड़ गई भायली ||

आंखे सारी नमकीन हुई हैं

मेहनत कबर में गड़ गई भायली||

पैबंद लगा जोड़ा था जिसको

चूनर सारी उधड़ गई भायली |

सोने सी बालें थी बिखरी

किसकी नज़र चढ़ गई भायली||