गांवो को आवाज

गाँवों को आवाज़

अब के खेतों में बिजूका कोई सजाया जाए |

पूरी आवाज़ से गाँवों को फिर बुलाया जाए ||

लोगों ने रख दिए हैं मेरी राहों में जो पत्थर

उनही पत्थरों से अब घर कोई बनाया जाए ||

ले चलें आज जुगनुओं की बारात झोंपड़ी में

यहाँ भी कभी एक नया सूरज जलाया जाए||

फिर टटोलें ज़रा नीम के नीचे दबे कहकहे

आज झुर्रियों को किसी बात पे हँसाया जाए||

फांसी चढ़ा दो इन खुदकशी की आदतों को

उसकी जिजीविषा को सूद समेत लौटाया जाए||

चिपकता है होठों पे मेरे ताजे गुड का जायका

‘उदास’चलो लोटे के सट्टुओं को खाया जाए||

 

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One thought on “गांवो को आवाज

  1. बचपन में गांव में बितायी गर्मी की छुट्टियों के दिन याद दिला गई आपकी यह कविता. बहुत खूब.

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