फूल कहते हैं

फूल कहते हैं

फूलों की पंखुड़ी पे रखी शबनम मुझसे बोली।
क्यों हो तुम खोई-खोई, क्या सोच रही हमजोली।।
ऐसा क्या है ग़म तुमको जो तुम भूली मुस्कान।
इस जग की सारी खुशियों से यूँफिरती हो अनजान।।
दर्द अगर है कोई जीवन में तो भी हँसते रहना।
सीखो इन फूलों से काँटों की चुभन भी सहना।।
तक़दीर ने तो फूलों को दिए हैं केवल काँटे।
लेकिन फूलों ने हर पल सबको सुख ही बाँटे।।
लोग कुचलकर इसके तन को कितनी दवा बनाएँ।
खु़द को मिटाकर भी ये सबकी जान बचाए।।
रंग-रूप निखारे सबका,सबका मन बहलाए।
रंग सजाकर अपना ये दुनिया रंगीन बनाए।।
पूजा की थाली में सजकर बने साधक की भाशा।
ईश्वर  के चरणों में चढ़कर पूरी कराए अभिलाषा।।
बिंधकर सूई से गजरा बन जब वेणी को सजाए।
प्रियतम के मन की बात कह प्रिया को मनाए।।
अंतिम यात्रा में भी यही अंत तक साथ निभाए।
सब छोड़े साथ पर ये खुद संग ही जल जाए।।
लोग तोड़ लेते इसको पर ये न शिकवा करता।
अपनी रंगो-खुशबू से है सबका मन ये हरता।।
काँटों में रहकर भी न अपना स्वभाव बदला।
बुरा करने वालों का भी करता सदा ही भला।।
और तुम हो कि ज़रा से कश्ट से हो घबराई।
शबनम की बातें सुनकर मैं ज़रा सा मुसकाई।।
अपने मन में सोचा फिर इस सच को पहचाना।
फूलों में इक गुरु छिपा है ग़र समझे इसे जमाना।।
माना मैंने जीचन है एक अग्नि परीक्षा।
पर फूलों ने दी मुझको आज नई ये शिक्षा।।
जीवन में भाग्य चाहे सुख दे या दुख बाँटे।
मुझे फूल ही बनना है त्याग निराशा के काँटे।।
फूल की हर पंखुड़ी का है सबसे यही कहना।
सुख आए या दुख बस हँसते ही रहना।।

डाॅ.सीमा ठाकुर

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