naheen karate

नहीं करते

यूं दिल के जज्बों को रुसवा कराया नहीं करते||

खत किसी को लिखकर जलाया नहीं करते||

सूरज से भी आँख मिलाने का दम रखते हैं

ये हौंसला हम सब पे मगर नुमाँया नहीं करते||

राज़दान एक हो तो राज बना रहता है

यूँ हाले-दिल सबको बताया नहीं करते||

आँखों में ही जो ठहरे तो शोले हो जाएंगे

पलकों से ये बूंदे गिराया नहीं करते||

ढूंढोगे तो मिलेगा अंधेरे में भी रास्ता

रौशनी के लिए घर किसी का जलाया नहीं करते||

‘उदास’ महफिलों की ज़ीनत है हमारी तबस्सुम

वरना तनहाई में तो कभी मुस्कराया नहीं करते||

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boodhaa himalaya

बूढ़ा हिमालय

बूढ़ा हिमालय रात भर खाँसता रहा|

पासबाँ बनके रात भर जागता रहा||

वादी में बिखरी रहीं चिंगारियाँ

कोई इस आग पर हाथ तापता रहा||

मेरे चमन के कई फूल मुरझाए मगर

मेरा माली बैठकर ताकता रहा||

हैं मेरे पास तालीम के कागजात

मगर इल्म दर-दर की खाक फाँकता रहा|

जुटा लिए कमरे को गरम करने के सामाँ

पास एक बूढ़ा ठंड से कांपता रहा||

हर किसी ने वादे किए रोटी के मगर

कोई बच्चा दर-दर भीख मांगता रहा||

मेरे घर में जब आग लगी ‘उदास’

मेरा पड़ौसी अपनी खिड़की से झाँकता रहा||

Papa

पापा

मेरे बचपन के आँँगन में तेरे लाड़ का साया।
मेरी जि़दग़ी है तेरे प्यार का सरमाया।।
मेरी तोतली बोली को दोहराना तेरा।
मुझे बाहर से आते ही गोद में उठाना तेरा।।
मुझको बाँहों के झूले में झुलाया तूने।
सौ बार सीने से लगाकर सुलाया तूने।।
वो टाॅफी, चाॅकलेट लेकर घर आना तेरा।
मुझको दरवाजे से ही आवाज़ लगाना तेरा।।
मेरी उँगली थामकर चलना सिखाया तूनेे।
मेरी राहों में सदा फूलों को बिछाया तूने।।
अपनी पलकों से चुनकर दर्द के काँटे।
तूने सदा खुशियों के फूल ही बाँटे।।
जि़ंदग़ी जीने का तूने ही पाठ पढ़ाया।
मेरी जि़दग़ी सँवारी ,मुझे आगे बढ़ाया।।
तुझको दे दूँ उपहार में चाँदी सोना।
मग़र तेरे प्यार के आगे सब है बौना।।
लब पर ये ही दुआ,दिल में ये ही तमन्ना।
हर जन्म में तुम मेरे ही पापा बनना।।
डाॅ. सीमा ठाकुर

मेरे मन में छिपा बच्चा

मेरे मन में छिपा बच्चा

मेरे मन में छिपा बच्चा
आज भी गिलहरियों के पीछे भागना चाहता है
चाहता है आज भी तितलियाँ पकड़ना
या कागज़ की चिंदियों को तितलियों सा उड़ाना
चाहता है बारिश के जमे पानी में छपाछप करना
या भरी हुई नालियों में नावें चलाना
बनते मकानों की रखी हुई बालू पर
दौड़कर चढ़ना और महल बनाना
टूट जाने पर उन महलों के ठहाके लगाना
बेवजह दौड़ना ,उछलना-कूदना
रास्ते की कंकरियों में ठोकर लगाना
या आम की गुठलियों से पपीहे बनाना
चढ़ना कूद कर पेड़ पर ,वो कच्चे अमरूद खाना
या बगीचे में जाकर गुलाब चुराना
मगर जिंदग़ी की हमग़ीरी में
ऐसे उलझे हैं हम
कि मन के इस बच्चे को सुला देते हैं हम
सुनाकर ज़रूरतों की लोरी
हमारी इस मतलबी मशरूफ़ दुनिया में
कहाँ जगह है इस बच्चे की खिलखिलाहट की
मग़र फिर भी कभी-कभी ही सही
मेरे मन में छिपा बच्चा……………

डाॅ.सीमा ठाकुर

फूल कहते हैं

फूल कहते हैं

फूलों की पंखुड़ी पे रखी शबनम मुझसे बोली।
क्यों हो तुम खोई-खोई, क्या सोच रही हमजोली।।
ऐसा क्या है ग़म तुमको जो तुम भूली मुस्कान।
इस जग की सारी खुशियों से यूँफिरती हो अनजान।।
दर्द अगर है कोई जीवन में तो भी हँसते रहना।
सीखो इन फूलों से काँटों की चुभन भी सहना।।
तक़दीर ने तो फूलों को दिए हैं केवल काँटे।
लेकिन फूलों ने हर पल सबको सुख ही बाँटे।।
लोग कुचलकर इसके तन को कितनी दवा बनाएँ।
खु़द को मिटाकर भी ये सबकी जान बचाए।।
रंग-रूप निखारे सबका,सबका मन बहलाए।
रंग सजाकर अपना ये दुनिया रंगीन बनाए।।
पूजा की थाली में सजकर बने साधक की भाशा।
ईश्वर  के चरणों में चढ़कर पूरी कराए अभिलाषा।।
बिंधकर सूई से गजरा बन जब वेणी को सजाए।
प्रियतम के मन की बात कह प्रिया को मनाए।।
अंतिम यात्रा में भी यही अंत तक साथ निभाए।
सब छोड़े साथ पर ये खुद संग ही जल जाए।।
लोग तोड़ लेते इसको पर ये न शिकवा करता।
अपनी रंगो-खुशबू से है सबका मन ये हरता।।
काँटों में रहकर भी न अपना स्वभाव बदला।
बुरा करने वालों का भी करता सदा ही भला।।
और तुम हो कि ज़रा से कश्ट से हो घबराई।
शबनम की बातें सुनकर मैं ज़रा सा मुसकाई।।
अपने मन में सोचा फिर इस सच को पहचाना।
फूलों में इक गुरु छिपा है ग़र समझे इसे जमाना।।
माना मैंने जीचन है एक अग्नि परीक्षा।
पर फूलों ने दी मुझको आज नई ये शिक्षा।।
जीवन में भाग्य चाहे सुख दे या दुख बाँटे।
मुझे फूल ही बनना है त्याग निराशा के काँटे।।
फूल की हर पंखुड़ी का है सबसे यही कहना।
सुख आए या दुख बस हँसते ही रहना।।

डाॅ.सीमा ठाकुर

नंदिनी

 नंदिनी

अपनों के लिए अपनों से दंश सह रही है नंदिनी।
संतान सफल हो इसलिए एकाकी रह रही है नंदिनी।।
बचपन की त्यागकर सभी अल्हड़ अठखेलियाँ
गंगा की तरह शांत गंभीर बह रही है नंदिनी।।
नव नीड़-निर्माण-निरत हैं सुत-सुता
उनकी खुशी के आशीर्वचन कह रही है नंदिनी।।
देह जीर्ण, हृदय विदीर्ण धारण किया पर धैर्य को
त्याग की प्रतिमूर्ति बन वसुधा सी सब सह रही है नंदिनी।।
नंदिनी नाम नारी का है जो सबके सुख में है सुखी
आरती की लौ बनी मौन जी रही है नंदिनी।।
          डाॅ.सीमा ठाकुर

कर्त्तव्य निभाएंगे

कर्त्तव्य निभाएँगे

सूरज से सीखो तुम भैया रोज़ समय से आना।
और सीखो तारों से तुम रातों को चमकाना।।
प्रकृति ने अपने-अपने सबको काम हैं बाँटे।
सब के हैं कर्त्तव्य  यहाँ पर फूल हो या काँटे।।
फूलों का है काम , सारी दुनिया को महकाना।
काँटों की ड्यूटी है उनको बुरी नजर से बचाना।।
नदियों का कर्त्तव्य  बना है सबकी प्यास बुझाना।
धरती करे व्यवस्था सबकी रहना हो या खाना।।
छोटे से तिनके का भी जब कुछ न कुछ कर्त्तव्य ।
सोचो हमें क्या करना है, हम तो हैं मनुष्य ।।
लें शपथ कि जी जान से अपना कर्त्तव्य  निभाएँगे।
मानवता की सेवा में जीवन अर्पित कर जाएँगे।।
                                  डाॅ. सीमा ठाकुर