मेरे मन में छिपा बच्चा

मेरे मन में छिपा बच्चा

मेरे मन में छिपा बच्चा
आज भी गिलहरियों के पीछे भागना चाहता है
चाहता है आज भी तितलियाँ पकड़ना
या कागज़ की चिंदियों को तितलियों सा उड़ाना
चाहता है बारिश के जमे पानी में छपाछप करना
या भरी हुई नालियों में नावें चलाना
बनते मकानों की रखी हुई बालू पर
दौड़कर चढ़ना और महल बनाना
टूट जाने पर उन महलों के ठहाके लगाना
बेवजह दौड़ना ,उछलना-कूदना
रास्ते की कंकरियों में ठोकर लगाना
या आम की गुठलियों से पपीहे बनाना
चढ़ना कूद कर पेड़ पर ,वो कच्चे अमरूद खाना
या बगीचे में जाकर गुलाब चुराना
मगर जिंदग़ी की हमग़ीरी में
ऐसे उलझे हैं हम
कि मन के इस बच्चे को सुला देते हैं हम
सुनाकर ज़रूरतों की लोरी
हमारी इस मतलबी मशरूफ़ दुनिया में
कहाँ जगह है इस बच्चे की खिलखिलाहट की
मग़र फिर भी कभी-कभी ही सही
मेरे मन में छिपा बच्चा……………

डाॅ.सीमा ठाकुर

Advertisements