boodhaa himalaya

बूढ़ा हिमालय

बूढ़ा हिमालय रात भर खाँसता रहा|

पासबाँ बनके रात भर जागता रहा||

वादी में बिखरी रहीं चिंगारियाँ

कोई इस आग पर हाथ तापता रहा||

मेरे चमन के कई फूल मुरझाए मगर

मेरा माली बैठकर ताकता रहा||

हैं मेरे पास तालीम के कागजात

मगर इल्म दर-दर की खाक फाँकता रहा|

जुटा लिए कमरे को गरम करने के सामाँ

पास एक बूढ़ा ठंड से कांपता रहा||

हर किसी ने वादे किए रोटी के मगर

कोई बच्चा दर-दर भीख मांगता रहा||

मेरे घर में जब आग लगी ‘उदास’

मेरा पड़ौसी अपनी खिड़की से झाँकता रहा||

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